भाजपा सरकार सामान्य वर्ग को हाशिए पर धकेल रही है?

मध्य प्रदेश के आईएएस अधिकारी एस. संतोष वर्मा के स्वर्ण समाज की महिलाओं के खिलाफ दिए गए आपत्तिजनक और अनैतिक बयान पर मचे बवाल ने एक बार फिर देश में सामान्य वर्ग (General Category) के प्रति राजनीतिक भेदभाव और उपेक्षा के ज्वलंत मुद्दे को सतह पर ला दिया है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा द्वारा लगाए गए वे गंभीर आरोप, जिनमें उन्होंने भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर संतोष वर्मा को बचाने और कार्रवाई में देरी करने का दावा किया, सामान्य वर्ग में पनप रहे व्यापक आक्रोश और असुरक्षा की भावना को दर्शाते हैं

यह मामला केवल एक अधिकारी के निलंबन या बर्खास्तगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी बहस को जन्म देता है: क्या भारतीय जनता पार्टी की सरकारें, अपनी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात के बावजूद, वास्तव में सामान्य वर्ग को देश में ‘दोयम दर्जे का नागरिक’ बनाने की राह पर चल पड़ी हैं?

संतोष वर्मा के मामले में, मिश्रा ने मोहन यादव सरकार पर कार्रवाई टालने और झूठी खबरें फैलाने का आरोप लगाया है। यह आरोप इस बात की ओर इशारा करता है कि जब बात सामान्य वर्ग के सम्मान की आती है, तो सरकार की प्रतिक्रिया अक्सर मंद और रक्षात्मक होती है। इसके विपरीत, आरक्षित वर्गों से जुड़े मुद्दों पर सरकारें त्वरित और कठोर कार्रवाई करती हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा, जो हमेशा से अपने ‘कट्टर समर्थकों’ (जिसमें बड़ा हिस्सा सामान्य वर्ग का माना जाता है) पर निर्भर रही है, अब उन्हें ‘निर्मित वोट बैंक’ मानकर अनदेखी कर रही है, और अपना ध्यान पिछड़ों, दलितों, जैसे वोट बैंक को आकर्षित करने पर केंद्रित कर रही है। यह रणनीति सामान्य वर्ग में यह संदेश देती है कि उनका समर्थन सुनिश्चित है, इसलिए उनकी समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।

सामान्य वर्ग की यह बढ़ती भावना कि उन्हें उपेक्षित किया जा रहा है, भारतीय राजनीति के लिए एक गंभीर चुनौती है। समाज के एक बड़े हिस्से में यह धारणा बलवती हो रही है कि सरकारें सामाजिक समीकरणों को साधने के क्रम में सामान्य वर्ग के हितों को दरकिनार कर रही हैं। आईएएस संतोष वर्मा के विवाद पर मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार द्वारा कठोर कार्रवाई में कथित देरी और झूठे प्रचार की खबरें इस आक्रोश को और भड़का रही हैं। अनिल मिश्रा द्वारा 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री घेराव की चेतावनी स्पष्ट संकेत देती है कि सामान्य वर्ग अब अपनी उपेक्षा को चुपचाप स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

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