6 दिसंबर 2025 (@reportcard): हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए कुल 243 सीटों में से 202 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की है। इस भारी बहुमत ने बिहार में सुशासन और विकास के एजेंडे को मज़बूती से स्थापित किया है। वहीं, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन (MGB) महज़ 35 सीटों पर सिमट गया, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई।

इस चुनाव में सबसे अच्छी बात यह रही कि जहां बिहार की राजनीति ‘कट्टा और सट्टा’ जैसे नकारात्मक विषयों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं इस बार चुनावी मुद्दा पलायन, रोज़गार, और कानून व्यवस्था बना।
जनता के बीच आज भी 90 के दशक के ‘लाल के जंगल राज’ की यादें इतनी गहरी हैं कि लोग उन्हें याद कर सिहर उठते हैं। चुनाव परिणामों में यह डर बखूबी दिखा—जहां मतदाताओं ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकारना तो दूर, उन्हें देखना भी पसंद नहीं किया। तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने का सपना और उनके सहयोगी मुकेश सहनी का उपमुख्यमंत्री बनने का ख्वाब इस जनादेश के आगे टूट गया
पुलिस की छवि बदलने की पहल: गाली-गलौज पर ‘कठोर सज़ा’
बिहार में पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की पुरानी छवि बेहद नकारात्मक रही है, जिसे अक्सर फिल्मों और स्थानीय कहावतों में ‘खच्चर’ या ‘गधों’ से तुलना की जाती रही है—यह कहते हुए कि पुलिस बिना पैसे के कुर्सी से हिलती नहीं है और शिकायत बाद में, गाली-गलौज पहले करती है।
इस नकारात्मक छवि को तोड़ने की दिशा में नई NDA सरकार ने तुरंत कदम उठाए हैं।
नव नियुक्त उपमुख्यमंत्री और गृह विभाग के प्रभारी, सम्राट चौधरी ने कुछ दिनों पहले एक महत्वपूर्ण ज्ञापन जारी करते हुए सभी पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। “किसी भी थाने में किसी भी पुलिसकर्मी द्वारा गाली-गलौज या ऐसा कोई भी व्यवहार, जो आम व्यक्ति के साथ उचित नहीं है, करते हुए पकड़ा गया, तो उसे कठोर सज़ा भुगतनी पड़ेगी।”

इस आदेश की व्यापक रूप से प्रशंसा हो रही है। लंबे समय से परेशान लोगों को अब यह उम्मीद बंधी है कि कम से कम अब वे बिना डर के और बिना अपमानित हुए थाने में अपनी शिकायत दर्ज करा पाएंगे। यह निर्देश उस पुरानी धारणा को तोड़ने का प्रयास है, जहां बिना पैसे के पुलिस अपना काम नहीं करती थी। गृह विभाग संभाल रहे सम्राट चौधरी स्वयं व्यक्तिगत रूप से इस छवि को बदलने पर ज़ोर दे रहे हैं। प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी भी अब खुद ज़मीनी स्तर पर कानून व्यवस्था को चौक-चौबंद बनाने की कोशिश में लगे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिहार की सरकार अपनी प्रतिबद्धता को ज़मीनी हकीकत में बदल पाएगी और क्या बिहार वाकई अपने ‘कट्टा और सट्टा’ वाली पुरानी नकारात्मक छवि से बाहर निकलकर सुशासन और बेहतर कानून व्यवस्था का प्रतीक बन पाएगा।




