मनोर, पालघर, महाराष्ट्र (26 मार्च 2026): रामनवमी के पावन अवसर पर पालघर जिले के मनोर में एक यादगार सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किया गया। बिरसायत संस्था की पहल पर श्री राम मंदिर, मनोर में 26 आदिवासी जोड़ों ने हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया। यह कार्यक्रम न केवल सामाजिक एकता का प्रतीक बना, बल्कि आदिवासी समाज की हिंदू परंपराओं से गहरी जुड़ाव को भी रेखांकित करता है।

समारोह बिरसायत संस्था के तत्वावधान में श्री राम मंदिर परिसर में संपन्न हुआ। संस्था के संचालक और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) महाराष्ट्र प्रदेश चिटणीस (प्रदेश सचिव) संतोष शिवराम जनाठे ने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे आयोजन का नेतृत्व किया और इसे आदिवासी भाई-बहनों को मुख्यधारा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
समारोह में स्वामी भारतानंद सरस्वती और अन्य साधु-संतों की उपस्थिति रही। सभी विवाह पूर्णतः हिंदू परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ।

संतोष जनाठे ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा,
“जो लोग कहते हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं, वे गलत हैं। हम भगवान राम के वंशज हैं। राम हमारे कण-कण में बसे हुए हैं। रामनवमी के इस पावन दिन पर ये जोड़े राम से जुड़ रहे हैं—ठीक उसी तरह जैसे वनवास के दौरान आदिवासी भाइयों ने भगवान राम का साथ दिया था। हमारे पुर्वज हिंदू थे और हम भी हिंदू हैं।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह आयोजन सिर्फ शादियां नहीं, बल्कि एक मजबूत सांस्कृतिक संदेश है—आदिवासी समाज की जड़ें हिंदू धर्म और संस्कृति से अटूट रूप से जुड़ी हुई हैं।
पालघर जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है। ऐसे में बिरसायत संस्था द्वारा आयोजित यह सामूहिक विवाह न केवल जोड़ों को आर्थिक बोझ से मुक्ति दिलाता है, बल्कि उन्हें हिंदू रीति-रिवाजों से जोड़कर सांस्कृतिक मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास भी करता है।
कार्यक्रम में भाजपा के स्थानीय नेता, कार्यकर्ता और विधायक हरिशचंद्र भोये भी मौजूद रहे। पूरे समारोह में भक्ति का माहौल छाया रहा—मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चार और उत्साही भीड़ ने इसे यादगार बना दिया।

बिरसायत संस्था लंबे समय से आदिवासी समाज के कल्याण, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत है। संतोष जनाठे, जो भाजपा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, ने पहले भी ऐसे कई कार्यक्रमों का आयोजन किया है। इस बार रामनवमी को चुना जाना विशेष रूप से प्रासंगिक था, क्योंकि यह अवसर भगवान राम की वनवास कथा और आदिवासी समुदाय के साथ उनके संबंध को याद दिलाता है।
जोड़ों और उनके परिवारों में खुशी का माहौल देखा गया। नवविवाहित जोड़ों ने पारंपरिक हिंदू वेशभूषा में सजकर फोटो सेशन किया, सिंदूरदान के पल को भावुकता से मनाया, और सामूहिक उत्सव का आनंद लिया।
समारोह के अंत में सभी ने जय श्री राम के नारे लगाए। यह आयोजन न केवल 26 जोड़ों के लिए नई शुरुआत था, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण भी साबित हुआ।
संतोष जनाठे और बिरसायत टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए स्थानीय लोग इसे “आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने का एक बड़ा कदम” बता रहे हैं।



