सारण, बिहार | रिपोर्टर: डेस्क
बिहार के सारण जिले से आई एक हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर सुशासन के दावों की पोल खोल दी है। यह मामला केवल एक बलात्कार और हत्या का नहीं है, बल्कि यह कहानी है एक ‘फेल्ड स्टेट’ (विफल राज्य) की, जहाँ अपराधी को उसके अपराध से नहीं, बल्कि उसकी जाति और वोट बैंक की राजनीति से तौला जा रहा है।
दैनिक भास्कर के अनुसार, इस जघन्य अपराध के मुख्य आरोपी सचिन मांझी, युवराज मांझी, चंदन मांझी, अजय मांझी और विकास मांझी हैं। ये सभी सरकारी रिकॉर्ड में ‘महादलित’ और ‘शोषित वर्ग’ से आते हैं। भास्कर की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इन आरोपियों ने पीड़िता के साथ पहले भी कई बार छेड़छाड़ की थी।
पीड़ित परिवार ने जब भी आवाज उठाने की कोशिश की, इन लड़कों ने उन्हें ST/SC Act के तहत फर्जी मुकदमे में फंसाने की धमकी दी। यही कारण था कि डर के मारे पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि पुलिस को इस छेड़छाड़ की सूचना पहले से थी, लेकिन बिहार पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक विफलता के कारण कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह कोई अचानक हुई वारदात नहीं है। आरोप लग रहे हैं कि पिछले कई वर्षों से दलित वर्ग को ‘जनरल कैटेगरी’ की महिलाओं के खिलाफ ‘सुधीकरण’ (बलात्कार) के लिए उकसाया जा रहा है।
यह वैचारिक जहर JNU जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों तक पहुँच चुका है, जहाँ की दीवारों पर ‘ब्राह्मण-बनिया भारत छोड़ो’ जैसे नारे लिखे जाते हैं और सरेआम ब्राह्मणों का खून बहाने की धमकियाँ दी जाती हैं। इस घृणा की आग को हवा देने में राकेश कुशवाहा, भीम आर्मी कार्यकर्ता गोल्डन दास, वर्तमान IAS संतोष वर्मा और मकरंद बौद्ध जैसे सैकड़ों लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, जो दिन-रात समाज में जातिवादी विद्वेष फैलाते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि सरकार इन तत्वों के सामने नतमस्तक है और आज तक इनमें से किसी पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं की गई।


सारण के SSP ने इस मामले में जो रुख अपनाया, उसने न्याय की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जांच पूरी होने से पहले ही उन्होंने घोषणा कर दी कि “लड़की खुद कुएं में कूद गई थी”, जिससे उसकी मौत हुई। इसे सीधे तौर पर अपराधियों को बचाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सत्ता और प्रशासन का यह रवैया साफ करता है कि जब अपराधी खास वोट बैंक से जुड़े हों, तो न्याय का गला घोंटने में देर नहीं लगाई जाती।
लेकिन गौरतलब बात यह है कि यह मामला मुख्यधारा के मीडिया और विपक्षी राजनीति के दोहरे चरित्र को नंगा करता है। हाथरस की घटना पर राहुल गांधी, पत्रकार चित्रा त्रिपाठी और प्रज्ञा यादव (प्रचलित नाम प्रज्ञा मिश्रा) ने जो कोहराम मचाया था, वह आज सारण के मामले में पूरी तरह गायब है, कोई लाइव रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है।
कारण हाथरस में आरोपी ‘ठाकुर समाज’ से थे, इसलिए उसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया, जबकि बाद में कई पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वहां सच्चाई कुछ और थी—परिवार ने मुआवजे के लिए अपनी हि लड़की की हत्या कर आरोप ठाकुर समाज के लड़कों पर लगा दिया ताकि मामले को जातिवादी रंग दिया था। हालांकि कोर्ट ने उन्हें बरी अन्य दिया था। लेकिन आज, जब अपराधी दलित समाज से हैं और पीड़िता सामान्य वर्ग की है, तो राहुल गांधी पीड़ित परिवार से मिलने तक नहीं गए। टीवी मीडिया की चुप्पी इस बात का सबूत है कि न्याय अब जाति देखकर तय किया जाता है।
सरकार का यह लचर रवैया अब जनरल कैटेगरी के लोगों के लिए जीवन-मरण का सवाल बन गया है। जब अपराधी को ‘जातिगत सुरक्षा कवच’ मिल जाए और रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो समाज में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा होने का डर रहता है। क्या बिहार की सरकार और देश का मुख्यधारा मीडिया इस बेटी को वह सम्मान और न्याय दिला पाएगा, जिसका वह हकदार थी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?




