नई दिल्ली, 1 दिसंबर 2025
“प्राडा की चप्पल पहनने वाले से बीड़ी पीने वाले हिडिंबा तक वामपंथियों का चरित्र और चेहरा छल कपट और धोखे से भरा हुआ है। वामपंथी ना सिर्फ भोले भाले आदिवासियों को अपने चपेट में लेकर उन्हें बहलाते फुसलाते और अपने ही देश में उग्रवादी बनाते हैं बल्कि देश के अलग-अलग जगह पर उनके देश के खिलाफ भी अलग-अलग आंदोलन चल रहे होते हैं। वैसे तो वामपंथ समाज में आज खत्म होने के कगार पर है लेकिन जैसे ही रंबा जैसा कोई नक्सली मारा जाता है इन वामपंथियों के सूख चुके स्तन के अंदर अचानक से दूध की धारा बहने लगती है और यह वामपंथी इंडिया गेट पर प्रदूषण के खिलाफ हो रहे आंदोलन में भी हिडिंबा जैसे नारे लगाते हैं। बम पठानों की कहानी की यह तो बस एक शुरुआत है।

आतंकवाद कि मानव अधिकार से लेकर अपने ही देश को तोड़ने की बात करने वाले एवं पैंथर जेएनयू में एक ऐसे परजीवी की तरह है जो देश के सबसे बड़े संस्थान को ना सिर्फ खोखला कर रहे हैं। बल्कि कई करोड़ के अनुदान से चलने वाले जेएनयू जैसे संस्थान का देश में योगदान भी अब शून्य के बराबर होता चला जा रहा है। इसके पीछे का कारण क्योंकि यह वामपंथी जिस सब्जेक्ट में पीएचडी और एमफिल कर रहे हैं उसे सब्जेक्ट से इन वामपंथी को भी पता है कि उनके जीवन में होना कुछ नहीं है।
वामपंथी बात तो विज्ञान और वैज्ञानिकता की करते हैं लेकिन विज्ञान से इनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। शायद ही आपको कोई ऐसा वामपंथी दिखे जो साइंस से स्नातक की डिग्री लिया हो या उसे पीएचडी हासिल किया हो। किसी भी वैज्ञानिक को आप वामपंथी के सपोर्ट में नहीं देखेंगे। कारण यह भी है कि वैज्ञानिक को अपने कॉलेज में पढ़ने के अलावा दूसरे कार्यों के लिए छुट्टी ही नहीं मिलती लेकिन वही दिल्ली के गेटवे ऑफ इंडिया और जंतर मंतर पर वामपंथि रोज धरना देते और बिरयानी खाते दिखाई दे देंगे।
महिला सशक्तिकरण के नाम पर वाइब्रेटर का इस्तेमाल और पब्लिक प्लेस पर चुंबन और सेक्स की दुहाई देते घूमते रहते हैं।”
चेहरा जितना खिलौना और बदसूरत है, उससे कहीं ज्यादा घिनौनी इनकी सोच और कारनामे हैं




