गुवाहाटी, 29 नवंबर 2025
असम विधानसभा ने25 नवंबर 2025 को “असम बहुविवाह निषेध विधेयक 2025” को ध्वनिमत से पारित कर दिया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा ने विधेयक पारित होने के तुरंत बाद अपने आधिकारिक X हैंडल पर लगातार पोस्ट कर इसकी घोषणा की और एक नया विवाद खड़ा कर दिया।
पहली पोस्ट में उन्होंने लिखा: “शादी करो, मगर लिमिट में।” पोस्ट में एक फोटो टैग करते हुए उन्होंने साफ-साफ चेतावनी दी: “अगर आपको सरकारी नौकरी चाहिए, सरकारी स्कीम चाहिए, लोकल इलेक्शन में हिस्सेदारी चाहिए तो अब दो शादियाँ नहीं चलेंगी। अगर दोषी पाए गए तो सरकारी नौकरी, सरकारी स्कीम और लोकल चुनाव से आजीवन बाहर कर दिया जाएगा।”
इन पोस्ट्स ने सोशल मीडिया पर तूफान मचा दिया है। कई लोग इसे “महिलाओं के हक की बड़ी जीत” बता रहे हैं तो कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन और विपक्षी दल इसे “मुस्लिम समुदाय को सरकारी लाभों से वंचित करने की खुली धमकी” बता रहे हैं।
विपक्ष की खामोशी और कांग्रेस की दुविधा
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की ओर से अभी तक कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बच रहा है। पार्टी को डर है कि अगर उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ की रक्षा में जोरदार बयान दिया तो हिंदू मतदाता एक बार फिर उससे और दूर हो जाएंगे।
हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का करारी हार इसका जीता-जागता उदाहरण है। विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी और पार्टी के कई नेताओं के बयानों को “हिंदू-विरोधी” बताकर प्रचारित करने से पार्टी की छवि को भारी नुकसान हुआ था। नतीजा यह रहा कि बिहार में कांग्रेस अपनी जमानत तक नहीं बचा पाई।
असम में भी कांग्रेस नहीं चाहती कि 2026 के चुनाव से पहले उसे फिर “मुस्लिमपरस्त” और “हिंदू-विरोधी” करार दिया जाए। यही कारण है कि देर रात तक भी कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने इस मुद्दे पर खुलकर कुछ नहीं बोला।
असम की सियासत एक बार फिर धर्म, कानून और वोट की त्रिकोणीय जंग में उलझ गई है। आने वाले दिन बताएंगे कि हिमंत बिस्वा शर्मा का “शादी करो, मगर लिमिट में” वाला नारा 2026 में उनके लिए संजीवनी बनेगा या नया विवाद।




