लखनऊ की विशेष अदालत ने हाल ही में अधिवक्ता परमानंद गुप्ता को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST एक्ट) के तहत 11 झूठे मामलों को गढ़ने के लिए कड़ी सजा सुनाई है।
लखनऊ की SC/ST एक्ट विशेष अदालत ने 4 नवंबर 2025 को अधिवक्ता परमानंद गुप्ता को 12 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। गुप्ता पर आरोप था कि उन्होंने अपनी पत्नी के सैलून में काम करने वाली एक दलित महिला पूजा रावत को उकसाकर संपत्ति विवाद में फंसाने के लिए 11 झूठे FIR दर्ज कराए। इनमें SC/ST एक्ट के साथ-साथ बलात्कार, मारपीट और अन्य धाराओं का भी दुरुपयोग किया गया। विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने सजा सुनाते हुए कहा कि गुप्ता ने सरकारी धनराशि प्राप्त करने और व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए एक्ट का दुरुपयोग किया। इसके अलावा, कोर्ट ने 45 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और पूजा रावत को चेतावनी दी कि भविष्य में दुरुपयोग पर कड़ी कार्रवाई होगी।
यह सजा गुप्ता के लिए दूसरी बड़ी सजा है। इससे पहले, अगस्त 2025 में उसी अदालत ने उन्हें 29 झूठे मामलों (जिनमें SC/ST एक्ट, रेप आदि शामिल थे) के लिए उम्रकैद और 5.10 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। जांच में सामने आया कि गुप्ता ने पूजा को धोखे से फंसाया और उसके आधार कार्ड का इस्तेमाल कर फर्जी शिकायतें दर्ज कराईं। पीड़िता पूजा ने बाद में अपना बयान बदलते हुए कहा कि कोई घटना नहीं हुई थी। कोर्ट ने एसीपी राधा रमण सिंह की जांच की सराहना की और बार काउंसिल को सूचित करने का आदेश दिया ताकि गुप्ता को वकालत से रोका जा सके।
SC/ST एक्ट 1989 में लागू किया गया एक केंद्रीय कानून है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना है। इसमें धारा 3 के तहत अपमानजनक भाषा, शारीरिक हमला, संपत्ति हड़पना आदि को अपराध माना गया है। गिरफ्तारी तत्काल होती है, जमानत कठिन है, और विशेष अदालतों में सुनवाई होती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में दुरुपयोग रोकने के लिए प्रारंभिक जांच अनिवार्य की। फिर भी, यह कानून विवादास्पद बना हुआ है।
SC/ST एक्ट के नुकसान और दुरुपयोग
SC/ST एक्ट ने दलित-आदिवासी समुदायों को सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन इसका दुरुपयोग व्यक्तिगत रंजिश, संपत्ति विवाद या बदले की भावना से हो रहा है। इससे निर्दोष लोगों को जेल, मानसिक तनाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। निम्नलिखित प्रमुख नुकसान हैं:
- निर्दोषों की गिरफ्तारी और जमानत की कठिनाई: एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी होती है, बिना जांच के। जमानत के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी है, जो मुश्किल है। इससे निर्दोष परिवार बर्बाद हो जाते हैं। उदाहरणस्वरूप, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एक्ट का दुरुपयोग प्रतिशोध के लिए हो रहा है, जो न्याय प्रणाली को कमजोर करता है।
- कम दोषसिद्धि दर और पुलिस रिपोर्ट: कमजोर जांच से दोषसिद्धि दर घटती है, जो दुरुपयोग की धारणा पैदा करती है। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि अभद्र भाषा अकेले पर्याप्त नहीं; मंशा साबित होनी चाहिए। दुरुपयोग से एक्ट का मूल उद्देश्य कमजोर होता है, और समाज में जातिगत तनाव बढ़ता है।
- आर्थिक और सामाजिक हानि: झूठे मामलों से पीड़ित पक्ष को नौकरी, प्रतिष्ठा और आर्थिक नुकसान होता है। मध्य प्रदेश में एक सर्वे में 75% मामले झूठे पाए गए। कोर्ट ने झूठी शिकायतों पर धारा 182/214 के तहत दंड की सिफारिश की।
झूठे आरोपों की संख्या: आंकड़े
NCRB के आंकड़ों से स्पष्ट है कि SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों में 상당 संख्या झूठे या अपर्याप्त साक्ष्य वाले पाए जाते हैं। 2022 में SC के खिलाफ 57,582 मामले दर्ज हुए, जिनमें 15% फाइनल रिपोर्ट (झूठा/अपर्याप्त साक्ष्य) में बंद हुए। ST के लिए 10,064 मामले, 14.3% वृद्धि।
- 2015 NCRB: 5,347 मामले झूठे पाए गए (कुल के 10.8%)।
- 2016: 10% मामले झूठे बंद।
- 2011 UP: 1,043 मामले झूठे (कुल SC/ST के 13%)।
- मध्य प्रदेश सर्वे: 75% झूठे मामले।
निष्कर्ष
परमानंद गुप्ता का मामला SC/ST एक्ट के दुरुपयोग का जीवंत उदाहरण है, जो निर्दोषों को सताता है और कानून की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। एक्ट का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन दुरुपयोग रोकने के लिए मजबूत जांच, जागरूकता और कड़ी सजा जरूरी है। सरकार और अदालतों को संतुलित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिले और झूठे मामलों का अंत हो। यह फैसला अन्य दुरुपयोगियों के लिए चेतावनी है।




